मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27% आरक्षण देने के मुद्दे पर सभी राजनीतिक दल एकमत हो गए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में गुरुवार को सीएम हाउस में हुई सर्वदलीय बैठक में निर्णय लिया गया कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले पर जल्द सुनवाई के लिए सामूहिक पहल की जाएगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि “14% आरक्षण पहले से स्पष्ट है और 13% हिस्से पर रोक लगी हुई है। हम चाहते हैं कि कोर्ट जल्द फैसला करे ताकि आयु सीमा पार कर रहे अभ्यर्थियों को लाभ मिल सके।” उन्होंने यह भी बताया कि 10 सितंबर से पहले सभी वकील सामूहिक रूप से मिलकर रणनीति बनाएंगे।
बीजेपी सांसद गणेश सिंह ने दावा किया कि कानून पर कोई रोक नहीं है और केवल एडीपीओ पदों पर रोस्टर को लेकर स्टे है। वहीं, मुख्य सचिव और महाधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि इसी वजह से फिलहाल 27% आरक्षण का क्रियान्वयन संभव नहीं हो पा रहा।
बैठक के बाद कांग्रेस नेताओं ने सरकार पर श्रेय लेने का आरोप लगाया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि “कांग्रेस ने 2019 में 27% आरक्षण लागू किया था। आज की बैठक ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ जैसी रही। सरकार अपनी कथनी और करनी में फर्क दिखा रही है।” पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव ने कहा कि भाजपा सरकारों ने वर्षों तक ओबीसी आरक्षण की अनदेखी की, जबकि कांग्रेस ने इसे लागू किया।
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी सोशल मीडिया पर सरकार को घेरते हुए लिखा कि “कांग्रेस पहले ही 27% आरक्षण लागू कर चुकी है। सर्वदलीय बैठक जनता को गुमराह करने का प्रयास है।”
समाजवादी पार्टी ने भी 27% आरक्षण लागू करने की मांग की और कहा कि पिछड़े वर्ग की वास्तविक हिस्सेदारी को देखते हुए 52% आरक्षण मिलना चाहिए।
साल 2019 में कमलनाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का फैसला लिया था। लेकिन हाईकोर्ट में याचिकाओं के बाद मई 2020 से इस पर रोक लगी हुई है। अदालत का तर्क था कि इससे आरक्षण की कुल सीमा 50% से अधिक हो जाएगी, जो सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी केस (1992) के फैसले का उल्लंघन होगा।
इसके चलते एमपीपीएससी और शिक्षकों की भर्ती सहित कई नियुक्तियां अटक गईं। लाखों अभ्यर्थियों का चयन होने के बावजूद उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं मिल पाया।
बैठक से एक दिन पहले एमपीपीएससी ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर पुराने एफिडेविट को वापस लेने और संशोधित एफिडेविट दाखिल करने की अनुमति मांगी थी। आयोग ने माना कि पिछले हलफनामे में तकनीकी त्रुटियां थीं और इसके लिए बिना शर्त माफी भी मांगी।
अब सभी दलों की सहमति के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट में 22 सितंबर से शुरू होने वाली सुनवाई में इस मुद्दे पर कोई ठोस निर्णय आ सकता है।

