नई दिल्ली/श्रीहरिकोटा: भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने शनिवार को एक अहम उपलब्धि हासिल की। हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस ने देश के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ का सफल प्रक्षेपण किया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित इसरो के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से दोपहर 12:05 बजे लॉन्च किए गए रॉकेट ने पृथ्वी से करीब 450 किलोमीटर ऊंचाई पर लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में सफलतापूर्वक प्रवेश किया।
यह पहली बार है जब किसी भारतीय निजी कंपनी ने ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट को अंतरिक्ष की कक्षा तक सफलतापूर्वक पहुंचाया। लॉन्च से कुछ मिनट पहले तकनीकी कारणों से काउंटडाउन रोका गया था, लेकिन जांच के बाद प्रक्षेपण निर्धारित समय से कुछ देर बाद सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि पर स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पवन कुमार चंदना को फोन कर बधाई दी। उन्होंने इसे भारत की अंतरिक्ष यात्रा में “ऐतिहासिक नया अध्याय” बताते हुए कहा कि यह देश के युवाओं की प्रतिभा और निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में हुए सुधारों का उदाहरण है।
2022 के ‘विक्रम-एस’ के बाद अगला कदम
स्काईरूट एयरोस्पेस ने वर्ष 2022 में ‘विक्रम-एस’ नाम का सब-ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया था, जो 89.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा था। वहीं ‘विक्रम-1’ पहली बार किसी निजी भारतीय कंपनी का ऐसा रॉकेट बना है, जिसने उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने की क्षमता का सफल प्रदर्शन किया है।
‘मिशन आगमन’ के तहत कई पेलोड भेजे गए
‘मिशन आगमन’ नाम से संचालित इस उड़ान में कई तकनीकी और व्यावसायिक पेलोड अंतरिक्ष में भेजे गए। इनमें भारतीय कंपनियों के तकनीकी उपकरणों के साथ 18 कैरेट सोने से बना एक सूक्ष्म रॉकेट, जिस पर वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और सर सी.वी. रमन की आकृतियां उकेरी गई हैं, भी शामिल था।
रॉकेट के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ से लिखा एक पोस्टकार्ड भी भेजा गया, जिस पर “वंदे मातरम्” अंकित है।
कार्बन-कंपोजिट तकनीक से तैयार रॉकेट
करीब 24 मीटर लंबा ‘विक्रम-1’ पूरी तरह हल्के कार्बन-कंपोजिट ढांचे से बना है। इसमें तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है, जो उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षा में स्थापित करने में मदद करता है। यह रॉकेट करीब 350 किलोग्राम तक के पेलोड को लो अर्थ ऑर्बिट में पहुंचाने में सक्षम है।
भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए क्यों अहम है यह मिशन?
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘विक्रम-1’ की सफलता भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इससे निजी कंपनियों के लिए उपग्रह प्रक्षेपण सेवाओं का रास्ता और मजबूत होगा, वैश्विक लॉन्च बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ सकती है और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में निवेश, नवाचार तथा रोजगार के नए अवसर पैदा होने की संभावना है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में इस समय 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप सक्रिय हैं, जबकि 2014 में ऐसे स्टार्टअप की संख्या केवल एक थी। ‘विक्रम-1’ की सफलता को इस बढ़ते निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।

