मुंबई 2006 ट्रेन ब्लास्ट केस:12 आरोपियों को बॉम्बे हाईकोर्ट से बरी,कोर्ट ने कहा- सबूत नाकाफी

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मुंबई में 2006 में हुए सिलसिलेवार लोकल ट्रेन धमाकों के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि सरकारी पक्ष आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सका और यह मानना मुश्किल है कि उन्होंने अपराध किया है। यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांटेड नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत जेल से रिहा किया जाए।

11 जुलाई 2006 को वेस्टर्न रेलवे की लोकल ट्रेनों के फर्स्ट क्लास कोच में सात धमाके हुए थे, जिनमें 189 लोगों की मौत हो गई थी और 800 से अधिक लोग घायल हुए थे। धमाकों में आरडीएक्स, अमोनियम नाइट्रेट, फ्यूल ऑयल और कीलों से बने प्रेशर कुकर बम इस्तेमाल किए गए थे।

पुलिस की चार्जशीट में 30 आरोपी थे, जिनमें 13 पाकिस्तानी नागरिक बताए गए थे। 13 में से 13 आरोपी कभी पकड़े नहीं जा सके।

हाईकोर्ट के फैसले से पहले निचली अदालत ने 2015 में पांच आरोपियों को फांसी और सात को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ 2016 में अपील दायर की गई थी, जिस पर करीब 9 साल बाद अब फैसला आया है। एक आरोपी की जेल में ही मौत हो चुकी है।

हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की जा सकती है।

क्या था मामला?

घटना शाम 6:24 से 6:35 के बीच हुई थी। खार, बांद्रा, जोगेश्वरी, माहिम, बोरीवली, माटुंगा और मीरा-भायंदर के पास फर्स्ट क्लास कोच में एक के बाद एक सात धमाके हुए।

एटीएस ने कहा था कि पाकिस्तान के बहावलपुर में लश्कर-ए-तैयबा ने इस साजिश को अंजाम दिया था। वहां ट्रेनिंग के लिए युवकों को भेजा गया, जहां उन्हें बम बनाने की ट्रेनिंग दी गई।

आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है, लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है। पीड़ित परिवारों और समाज के लिए यह फैसला असमंजस और निराशा का कारण बन सकता है, जबकि आरोपी पक्ष इसे न्याय की जीत बता रहे हैं।

19 साल बाद आए इस फैसले ने फिर एक बार देश की आतंकवाद विरोधी जांच प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।