शेखावत बोले:डॉ. मुखर्जी का बलिदान अखंड भारत के संकल्प की निर्णायक मिसाल

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भरतपुर, 23 जून। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्‍द्र सिंह शेखावत ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन और बलिदान भारत की एकता, अखंडता और राष्ट्रीय स्वाभिमान का अमर प्रतीक है। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी के विराट व्यक्तित्व को समझने के लिए वर्ष 1953 के उस दौर को याद करना होगा, जब जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया जा रहा था और भारतीय नागरिकों को वहां जाने के लिए परमिट लेना पड़ता था।

मंगलवार को भाजपा के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ‘बलिदान दिवस’ पर आयोजित कार्यक्रम को केंद्रीय मंत्री शेखावत ने संबोधित किया। शेखावत ने कहा कि डॉ. मुखर्जी सत्ता और पद के मोह से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के लिए संघर्ष करने वाले नेता थे। उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ का ऐतिहासिक उद्घोष किया और बिना परमिट जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कर तत्कालीन व्यवस्था को चुनौती दी, जो अखंड भारत की एक निर्णायक लड़ाई थी। शेखावत ने कहा कि 23 जून 1953 को श्रीनगर में इस संघर्ष के साथ रहस्यमय परिस्थितियों में हुई उनकी मृत्यु ने उन्हें राष्ट्रभक्ति और बलिदान के अमर प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि डॉ. मुखर्जी केवल एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता ही नहीं, अपितु महान शिक्षाविद और दूरदर्शी चिंतक भी थे। उन्होंने कम आयु में युनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता के कुलपति के रूप में कार्य करते हुए भारतीय भाषाओं, मातृभाषा आधारित शिक्षा और स्वदेशी ज्ञान परंपरा को बढ़ावा दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा, संस्कृति और स्वाभिमान को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला मानने वाले डॉ. मुखर्जी का दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक है।

शेखावत ने आगे कहा कि वित्त मंत्री और प्रशासक के रूप में भी डॉ. मुखर्जी ने संकट के समय प्रभावी नेतृत्व का परिचय दिया। उन्होंने बंगाल में खाद्यान्न संकट, प्राकृतिक आपदाओं और आर्थिक चुनौतियों के दौरान जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उन्‍होंने कहा कि संविधान निर्माण के दौर में भी डॉ. मुखर्जी ने भारत की सांस्कृतिक जड़ों, राष्ट्रीय एकता और नागरिक अधिकारों के पक्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि देश आज भी उनके आदर्शों और राष्ट्र प्रथम के सिद्धांत से प्रेरणा प्राप्त कर रहा है।

दक्षिण भारत और वैज्ञानिक भारत के पक्षधर थे डॉ. मुखर्जी
शेखावत ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का दृष्टिकोण पूरे भारत को समाहित करने वाला था। उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), बेंगलुरु से जुड़े रहते हुए स्वदेशी वैज्ञानिक अनुसंधान और संस्थागत स्वायत्तता को प्रोत्साहित किया। तमिलनाडु के शिवकाशी में संकटग्रस्त कुटीर उद्योगों को समर्थन देकर उन्होंने स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की। वह तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम सहित सभी भारतीय भाषाओं में मातृभाषा आधारित शिक्षा के समर्थक थे। उनका मानना था कि शिक्षा और विकास का लाभ देश के हर क्षेत्र और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचना चाहिए।

अनुच्छेद 370 हटना डॉ. मुखर्जी के संकल्प की सिद्धि
शेखावत ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए था। उन्होंने कहा कि 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटने के साथ उस ऐतिहासिक संघर्ष को नई दिशा मिली, जिसकी शुरुआत डॉ. मुखर्जी ने ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ के संकल्प के साथ की थी। उन्होंने कहा कि आज जम्मू-कश्मीर विकास, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकीकरण के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। लाल चौक पर गर्व से लहराता तिरंगा उस बलिदान की याद दिलाता है, जिसने राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि रखने का संदेश दिया।

‘विकसित भारत’ के लिए राष्ट्र-प्रथम का आह्वान
शेखावत ने नागरिकों से राष्ट्र-प्रथम की भावना को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, अपितु राष्ट्रीय चरित्र, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक समरसता से हासिल होगा। उन्‍होंने कहा, डॉ. मुखर्जी का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्रहित को व्यक्तिगत और राजनीतिक हितों से ऊपर रखना ही सच्ची देशभक्ति है। उन्होंने उपस्थित लोगों से आत्मनिर्भर, एकजुट और सांस्कृतिक रूप से जागृत भारत के निर्माण का संकल्प लेने का आग्रह किया, ताकि देश का कोई भी क्षेत्र, भाषा या वर्ग विकास यात्रा से वंचित न रहे।