राजस्थान में फिर उठी ‘भील प्रदेश’ की मांग,भाजपा ने किया विरोध

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राजस्थान के डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिलों में एक बार फिर ‘भील प्रदेश’ की मांग को लेकर आदिवासी समाज ने आवाज उठाई है। भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपते हुए अलग राज्य की मांग की है, जिसमें राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल इलाकों को मिलाकर नया राज्य बनाए जाने की बात कही गई है।

इस मांग पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने जयपुर में मीडिया से बातचीत में कहा, “भाजपा इस मांग को पूरी तरह से खारिज करती है। जाति और वर्ग के नाम पर देश और प्रदेश को बांटने की कोशिश किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”

“सिर्फ राजनीति हो रही है”: भाजपा अध्यक्ष

भाजपा अध्यक्ष राठौड़ ने आरोप लगाया कि यह मांग कुछ नेताओं की “राजनीतिक महत्वाकांक्षा” का परिणाम है। उन्होंने कहा, “कुछ लोग अपनी राजनीति चमकाने के लिए भोली-भाली जनता को गुमराह कर रहे हैं। समाज इन्हें माफ नहीं करेगा। जो लोग भील प्रदेश की मांग कर रहे हैं, उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं और बड़े मकानों में रहते हैं।”

राठौड़ ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें वागड़ क्षेत्र के समग्र विकास के लिए लगातार काम कर रही हैं और ऐसी मांगें केवल विघटनकारी सोच को दर्शाती हैं।

क्या है भील प्रदेश की मांग?

भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा ने मांग की है कि राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल 49 जिलों को मिलाकर एक नया राज्य ‘भील प्रदेश’ बनाया जाए।
उनका कहना है कि इन क्षेत्रों में आदिवासियों की संस्कृति, भाषा, पहनावा और रहन-सहन समान है। अलग राज्य बनने से आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा होगी और उनके लिए विशेष विकास योजनाएं बनाई जा सकेंगी।

किन जिलों को शामिल करने की मांग?

भील प्रदेश में जिन जिलों को शामिल करने की मांग की गई है, उनमें शामिल हैं:

  • राजस्थान: बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, उदयपुर, सिरोही, पाली, बारां, कोटा, झालावाड़, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, जालौर, बाड़मेर
  • मध्य प्रदेश: धार, झाबुआ, अलीराजपुर, खंडवा, खरगोन, बड़वानी, मंदसौर, रतलाम, नीमच, देवास, गुना, शिवपुरी, इंदौर, बुरहानपुर
  • गुजरात: दाहोद, पंचमहल, अरवल्ली, महीसागर, छोटा उदेपुर, नवसारी, सूरत, तापी, भरूच, नर्मदा, वलसाड, बड़ोदरा, साबरकांठा, बनासकांठा
  • महाराष्ट्र: नासिक, जलगांव, धुले, नंदुरबार, पालघर, ठाणे

आदिवासी सांसद का समर्थन

बांसवाड़ा-डूंगरपुर के सांसद राजकुमार रोत ने भी इस मांग का समर्थन करते हुए कहा कि “आदिवासी बहुल इलाकों को मिलाकर लंबे समय से भील प्रदेश की मांग की जा रही है। एक समान संस्कृति और परंपराओं को देखते हुए यह जरूरी है कि आदिवासियों को उनके अधिकारों के साथ एक अलग पहचान दी जाए।”

हालांकि, यह मांग अभी शुरुआती स्तर पर ही है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर चर्चाएं फिर से तेज हो गई हैं। भाजपा का विरोध इस पर सख्त है, जबकि आदिवासी संगठनों का दावा है कि यह संघर्ष उनके “अधिकार और अस्तित्व” की लड़ाई है।