जयपुर, 16 सितम्बर 2025। राजस्थान में मातृ मृत्यु दर (MMR) लगातार घट रही है, लेकिन गर्भवती महिलाओं में एनीमिया अभी भी गंभीर चुनौती बनी हुई है। हर दूसरी महिला इसके प्रभाव में है। इसी मुद्दे पर मंगलवार को जयपुर स्थित सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज में मातृ एनीमिया न्यूनीकरण पर राज्य स्तरीय सम्मेलन आयोजित किया गया।
सम्मेलन में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, चिकित्सक, शोधकर्ता और विकास साझेदार शामिल हुए। चिकित्सा शिक्षा विभाग के सचिव अम्बरीश कुमार ने कहा कि पारंपरिक खानपान की सीख अब भी अहम है, लेकिन आधुनिक विज्ञान और जीवनशैली-आधारित हस्तक्षेपों का संयोजन ही स्थायी समाधान ला सकता है।
कार्यक्रम में प्रस्तुत रैपिडआयरन ट्रायल के नतीजों ने उम्मीद जगाई है। यह अध्ययन थॉमस जेफरसन यूनिवर्सिटी (अमेरिका), एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर और जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, बेलगावी द्वारा किया गया। इसमें 40 हजार से अधिक गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग की गई। नतीजों में पाया गया कि इंट्रावीनस फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज़ (IV-FCM) का एकल डोज़, मौखिक आयरन की तुलना में कम वजन वाले शिशुओं के जन्म का खतरा घटाता है और हीमोग्लोबिन स्तर बेहतर बनाता है।
मुख्य शोधकर्ता डॉ. रिचर्ड डर्मन ने कहा, “भारत में एनीमिया का बोझ विश्व में सबसे ज्यादा है और गर्भावस्था के दौरान आयरन की जरूरतें तेजी से बढ़ती हैं। जल्दी पहचान और उपचार ही सुरक्षित परिणामों की कुंजी है।”
राजस्थान सरकार ने मातृ स्वास्थ्य रणनीति के हिस्से के रूप में एनीमिया पर विशेष ध्यान देने की घोषणा की है। स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार पहल के तहत ग्रामीण इलाकों तक कार्यक्रम पहुंचाए जा रहे हैं। सरकार जल्द ही 5 जिलों में IV-FCM जैसी उन्नत उपचार पद्धतियों के पायलट प्रोजेक्ट शुरू करेगी।
एसएमएस मेडिकल कॉलेज की डॉ. मोनिका जैन ने कहा कि शुरुआती स्तर पर स्क्रीनिंग और पर्सनल काउंसलिंग बेहद जरूरी है। उन्होंने जोर दिया कि आयरन-युक्त खाद्य पदार्थ केवल सुझाए ही नहीं जाएं बल्कि आसानी से उपलब्ध भी कराए जाएं।
सम्मेलन में डॉ. सुधीर मेहता (निम्स यूनिवर्सिटी), डॉ. मृत्युंजय बेल्लड़ (जेएन मेडिकल कॉलेज, बेलगावी), डॉ. रितु जोशी (फोर्टिस एस्कॉर्ट्स व सूर्या हॉस्पिटल, जयपुर) सहित कई विशेषज्ञों ने भाग लिया।

