आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट सख़्त,राज्य सरकारों को भारी मुआवज़े की चेतावनी

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बच्चों और बुज़ुर्गों पर आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों को लेकर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि कुत्तों में फैलने वाला रेबीज़ जैसे घातक वायरस का कोई इलाज नहीं है और जब 9 साल के बच्चे पर हमला होता है तो इसकी ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले तथाकथित डॉग लवर्स जवाबदेही से नहीं बच सकते। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर लोग कुत्तों को खाना खिलाना चाहते हैं तो उन्हें अपने घर ले जाएं। अदालत ने चेतावनी दी कि कुत्तों के काटने से किसी बच्चे या बुज़ुर्ग की मौत या गंभीर चोट की स्थिति में राज्य सरकारों पर भारी मुआवज़ा लगाया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कोर्ट के 7 नवंबर 2025 के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस डिपो, रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डों के परिसरों में आवारा कुत्तों की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने वन्यजीव क्षेत्रों में भी आवारा कुत्तों से जैव विविधता को हो रहे खतरे का मुद्दा उठाया, खासकर लद्दाख में बड़ी संख्या में घूम रहे कुत्तों का ज़िक्र किया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर आम नागरिकों को सुरक्षित आवाजाही का अधिकार है और कुत्तों की मौजूदगी को लेकर किसी एक समूह की इच्छा बाकी लोगों पर थोपना ठीक नहीं है। जस्टिस मेहता ने सवाल उठाया कि अगर किसी रिहायशी इलाके में बहुसंख्यक लोग कुत्तों की मौजूदगी नहीं चाहते, तो अल्पसंख्यक की इच्छा को प्राथमिकता क्यों दी जाए।

देश में हर साल हज़ारों लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं और भारत में रेबीज़ से होने वाली मौतों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक मानी जाती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह सख़्त टिप्पणी स्थानीय निकायों, राज्य सरकारों और पशु प्रेमी संगठनों—तीनों के लिए अहम मानी जा रही है।