रिपोर्ट:-हर्षित नागदा
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र का आखिरी सप्ताह शुरू हो चुका है। 20 जुलाई से शुरू हुआ 2026 का मानसून सत्र 13 अगस्त तक चलना निर्धारित है। सत्र के लिए कुल 19 बैठकों का कार्यक्रम तय किया गया था। 10 अगस्त को अब इसके समापन में सिर्फ चार दिन बाकी हैं।
हालांकि, सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर मतभेद और सदन में व्यवधान के कारण सत्र का कामकाज लगातार प्रभावित हुआ है। ऐसे में चर्चा केवल इस बात की नहीं है कि बचे हुए चार दिनों में कितने विधेयक पारित होंगे, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि भारत की संसद साल में आखिर कितने दिन काम करती है और इन बैठकों का कितना हिस्सा प्रभावी संसदीय कामकाज में बदल पाता है।
आखिरी चार दिनों में क्या है सरकार के सामने चुनौती?
मानसून सत्र के अंतिम दिनों में महिला आरक्षण, परिसीमन और विदेशी अंशदान नियमन कानून यानी FCRA से जुड़े प्रस्तावों समेत कई मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं।
सरकार की कोशिश लंबित विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की है, जबकि विपक्ष इन मुद्दों के साथ-साथ दूसरे मामलों को लेकर भी सरकार पर दबाव बना रहा है।
10 अगस्त को लोकसभा ने Tribunals Reforms Bill, 2026 पारित किया। इस दौरान विपक्ष की ओर से विरोध और व्यवधान भी देखने को मिले।
ऐसे में सत्र के बाकी चार दिन सरकार और विपक्ष, दोनों के लिए अहम माने जा रहे हैं।
क्या संसद के लिए साल में बैठक के दिन तय हैं?
इसका जवाब है—नहीं।
भारतीय संविधान संसद के लिए हर साल बैठने वाले दिनों की कोई निश्चित संख्या तय नहीं करता। राष्ट्रपति समय-समय पर संसद के सत्र बुलाते हैं और दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए।
आम तौर पर संसद के तीन प्रमुख सत्र होते हैं—
- बजट सत्र
- मानसून सत्र
- शीतकालीन सत्र
इन सत्रों की अवधि और बैठकों की संख्या हर साल अलग हो सकती है।
साल में कितने दिन बैठती है संसद?
संसद के कामकाजी दिनों की संख्या हर साल बदलती रहती है।
मिसाल के तौर पर, 2025 के बजट सत्र में लोकसभा और राज्यसभा ने 26 दिन काम किया था, जबकि 2025 के मानसून सत्र में दोनों सदनों की 21 बैठकें हुई थीं।
इसका मतलब यह है कि संसद पूरे साल लगातार नहीं बैठती। अलग-अलग सत्रों के दौरान ही प्रश्नकाल, विधेयकों पर चर्चा, कानून निर्माण और दूसरे संसदीय काम किए जाते हैं।
संसद कितने दिन बैठी, इससे ज्यादा अहम है कितना काम हुआ
संसद के कामकाज का आकलन सिर्फ इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि सदन कितने दिन चला।
अगर किसी सत्र में बार-बार हंगामा और स्थगन होता है, तो निर्धारित समय का बड़ा हिस्सा चर्चा और विधायी काम में इस्तेमाल नहीं हो पाता।
PRS Legislative Research के विश्लेषण के मुताबिक, 2025 के मानसून सत्र में दोनों सदनों के निर्धारित समय का करीब दो-तिहाई हिस्सा व्यवधान से प्रभावित हुआ था। लोकसभा में प्रश्नकाल के लिए तय समय का करीब 23 प्रतिशत और राज्यसभा में करीब 6 प्रतिशत समय ही प्रभावी रूप से इस्तेमाल हो सका।
इसलिए संसद की कार्यक्षमता को मापने के लिए यह भी देखा जाता है कि कितने घंटे काम हुआ, कितनी चर्चा हुई, सांसदों के सवालों के कितने जवाब मिले और विधेयकों की कितनी विस्तार से जांच हुई।
क्या संसद को साल में ज्यादा दिन बैठना चाहिए?
संसद की कार्यक्षमता को लेकर यह बहस नई नहीं है।
एक राय यह है कि संसद को साल में ज्यादा दिन और अधिक नियमित रूप से बैठना चाहिए। इससे विधेयकों पर ज्यादा चर्चा, सरकार से अधिक सवाल और कानूनों की बेहतर जांच के लिए समय मिल सकता है।
दूसरी ओर, सिर्फ बैठक के दिनों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। अगर अतिरिक्त दिनों में भी सदन का बड़ा हिस्सा व्यवधान की भेंट चढ़ जाए, तो उससे संसदीय कामकाज में अपेक्षित सुधार नहीं आएगा।
आखिरी चार दिन क्यों हैं अहम?
2026 के मानसून सत्र के अब सिर्फ चार दिन बाकी हैं। सरकार के सामने लंबित विधायी काम को पूरा करने की चुनौती है, जबकि विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन इस सत्र की चर्चा सिर्फ पास हुए या लंबित विधेयकों तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी अहम है कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में संसद को कितने दिन बैठना चाहिए और उन दिनों में कितना सार्थक काम होना चाहिए।
आखिर संसद की कार्यक्षमता का पैमाना सिर्फ यह नहीं है कि वह साल में कितने दिन बैठी, बल्कि यह भी है कि उन दिनों में जनता से जुड़े मुद्दों पर कितनी गंभीर चर्चा हुई और कितने प्रभावी तरीके से कानून बनाए गए।

