सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच के संकेत दिए,नाबालिगों की रिहाई का आदेश

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सुप्रीम कोर्ट ने कथित NEET-UG 2026 पेपर लीक के विरोध में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा है कि पहली नज़र में मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता दिखाई देती है। अदालत ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और जरूरत से ज़्यादा बल प्रयोग करने वालों की जवाबदेही तय की जाएगी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अंतरिम आदेश में सभी राज्यों को निर्देश दिया कि प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए 18 वर्ष से कम उम्र के ऐसे छात्रों को तुरंत रिहा किया जाए, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि जिन वयस्क प्रदर्शनकारियों का भी कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, उनके खिलाफ फिलहाल कोई सख्त कार्रवाई न की जाए, हालांकि दर्ज मामलों की जांच कानून के मुताबिक जारी रह सकती है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पुलिस कार्रवाई से जुड़े सभी डिजिटल साक्ष्य, जिनमें CCTV फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी कैमरा फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड शामिल हैं, सुरक्षित रखे जाएं और अगली सुनवाई तक सार्वजनिक न किए जाएं।

याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुए और बाद में कई राज्यों तक फैले छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस, पेलेट गन और अन्य बल प्रयोग के तरीके अपनाए, जिससे कई प्रदर्शनकारी घायल हुए। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कुछ लोगों को गंभीर चोटें आईं और एक प्रदर्शनकारी की आंख की रोशनी तक चली गई। वहीं पुलिस की ओर से भी आरोप लगाए गए हैं कि प्रदर्शन के दौरान असामाजिक तत्वों ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया, जिसमें 250 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए।

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार स्वतंत्र जांच का विरोध नहीं करती, लेकिन पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। अदालत ने इस पर कहा कि स्वतंत्र जांच दोनों पक्षों के आरोपों की समान रूप से पड़ताल करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस कार्रवाई को लेकर पहले जारी दिशा-निर्देशों की समीक्षा का समय आ गया है। अदालत ने टिप्पणी की कि वर्ष 2018 में तय किए गए प्रोटोकॉल की 2026 की परिस्थितियों में प्रभावशीलता का आकलन किया जाना चाहिए, ताकि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पुलिस के लिए स्पष्ट और अद्यतन मानक तय किए जा सकें।

इसी मामले से जुड़ी एक अलग याचिका में सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आज़ाद समेत तीन याचिकाकर्ताओं ने भीड़ नियंत्रण के दौरान पेलेट गन और धातुयुक्त प्रोजेक्टाइल के इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग की है। याचिका में प्रदर्शन के दौरान घायल लोगों के लिए मुआवज़ा, बेहतर इलाज और पुनर्वास की भी मांग की गई है।अदालत ने दिल्ली समेत आठ राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी।