नई दिल्ली/जोधपुर, 10 अक्टूबर। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि कला केवल रंगों या रूपों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि यह हमारे जीवन, पर्यावरण और आर्थिक सशक्तीकरण का माध्यम भी है। उन्होंने कहा कि आदिवासी कलाकार अपने हुनर के माध्यम से न केवल जीवन जीते हैं, बल्कि अपने परिवेश, परंपरा और प्रकृति के साथ गहरे सामंजस्य का संदेश भी देते हैं।
शुक्रवार को ‘आदिवासी कलाएं और भारत का संरक्षण लोकाचार : जीवंत ज्ञान’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में शेखावत ने कहा कि भारत की विकास अवधारणा सदैव प्रकृति के साथ संबंध और संवाद पर आधारित रही है। हमारे आदिवासी समाज ने सदियों से अपने रीति-रिवाजों और कलाओं के माध्यम से एक पूरे इकोसिस्टम को जीवित एवं संतुलित बनाए रखा। हमारे ऋषि-मनीषियों ने जल, जंगल, जमीन और जीव-जंतुओं को धर्म से जोड़कर उनकी रक्षा का विधान किया। मां-बाप को देवता माना गया, जल को देवी, पहाड़ों और वृक्षों को देव रूप में पूजा गया, ताकि संरक्षण का भाव सहज रूप से समाज में स्थापित हो।
भारतीय संस्कृति की अनूठी पर्यावरणीय दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हमारे देवताओं के साथ हर प्राणी को जोड़ा गया, शिव के साथ नंदी, गणेश के साथ मूषक, सरस्वती के साथ हंस, लक्ष्मी के साथ उल्लू, कार्तिकेय के साथ मोर, दुर्गा के साथ शेर, कृष्ण के साथ गौ माता, हनुमान के साथ वानर और भैरव के साथ कुत्ता। यह प्रतीकात्मकता बताती है कि भारतीय सभ्यता ने पर्यावरण के हर घटक को सम्मान दिया है। उन्होंने कहा कि जब धर्म का तंतु कमजोर हुआ, तब हमारे जल, जंगल, जमीन और जानवरों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हुआ।
आदिवासी कलाकार प्रकृति के रक्षक
शेखावत ने कहा कि आदिवासी कलाकारों की कला केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने प्रदर्शनी में प्रदर्शित पेंटिंग्स की सराहना करते हुए कहा कि बिना संसाधनों के, सामान्य वस्तुओं से जो रचनाएँ इन कलाकारों ने तैयार की हैं, वे अद्भुत हैं, अप्रतिम हैं और प्रेरणादायक भी। ऐसे कलाकारों को केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि एक सशक्त आर्थिक प्लेटफॉर्म की आवश्यकता है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कला और संस्कृति का संरक्षण केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि उन्हें आर्थिक दृष्टि से सशक्त बनाकर ही संभव है। जब तक कला और कलाकार को इकोनॉमिक वैल्यू चेन से नहीं जोड़ा जाएगा, संरक्षण की बात अधूरी रहेगी। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया आज क्रिएटिव इकॉनमी को ऑरेंज इकॉनमी के रूप में पहचान रही है और भारत के पास अपनी विविधता और परंपरा के कारण इसमें असीम संभावनाएँ हैं।
कला को मोनेटाइज करना जरूरी
शेखावत ने उदाहरण देते हुए बताया कि ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित नेशनल आर्ट एग्ज़िबिशन में पहली बार कलाकारों की कलाकृतियों को उनके मूल्य टैग के साथ प्रदर्शित किया गया। हमने कलाकारों से पूछकर क्यूरेटर के साथ मिलकर उनकी पेंटिंग्स का मूल्य तय किया। परिणामस्वरूप, इस बार नवोदित कलाकारों की करीब ढाई करोड़ रुपये की पेंटिंग्स बिक गईं। उन्होंने कहा कि “कला केवल प्रदर्शनी की वस्तु नहीं होनी चाहिए, बल्कि कलाकार की आजीविका का साधन भी बने। केंद्रीय मंत्री ने एक संस्मरण बताया कि पहाड़ों और दूरदराज इलाकों में महिलाएं स्थानीय वस्त्र स्वयं बनाती हैं, पर उन्हें बाजार और डिजाइन की समझ नहीं होती। जब उनके प्रयास से उत्तराखंड के माणा गांव की बुनकर महिलाओं को डिजाइनरों से जोड़ा तो आज उनके उत्पाद दुनिया के प्रमुख ब्रांड स्टोर्स में बिक रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमें यही मॉडल आदिवासी कला पर लागू करना होगा। स्थानीय कला को आधुनिक बाजार से जोड़ना, ताकि वह आर्थिक रूप से टिकाऊ बन सके।
वेनिस बिनाले में दिखेगी भारतीय आदिवासी कला की झलक
शेखावत ने कहा कि इस वर्ष भारत दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित कला आयोजन वेनिस बिनाले में भाग लेगा। हम वहां दिग्गज कलाकारों के साथ-साथ आदिवासी और नवोदित कलाकारों को भी अवसर देंगे। उनकी रचनाएं वैश्विक मंच पर प्रदर्शित होंगी, ताकि दुनिया भारत की जड़ों और उसकी कलात्मक आत्मा को देख सके।

